कल की बात: गांधार - प्रचंड प्रवीर

4th April 2022

आप बीती दस्तावेजों का कथा संसार है “कल की बात:गांधार”
 
लेखक - प्रचंड प्रवीर
प्रकाशक - सेतु प्रकाशन
 
यह किताब लेखक प्रचण्ड प्रवीर जी की लघु कथाओं की तीसरी श्रृंखला है जिसमें कल की बात 20 अप्रैल साल 2016 से शुरू होती है और 12 नवम्बर 2019 तक अबाध चलती जाती है। इन दिनों में लेखक ने अपने साथ घटित हुई कथाओं को बेहद खूबसूरत ढंग से संजोते हुए अपनी बात को रखा है । ये कथाएं ऐसी हैं जैसे आपके साथ ही घटित हो रही हो।
 
'कल की बात:गान्धार' में लेखक ने कुल 39 कहानियों या सही शब्दों में कहें तो अपनी आप बीती को बहुत ख़ूबसूरत तरीके से संकलित किया है। इन कहानियों में मिलती है भारतीय संस्कृति, परंपरा और लहज़ा जो आपको अंत तक जोड़े रखने में कामयाब सिद्ध होती है. इन कहानियों में व्यंग्य, सीख, मधुरता और प्रेम सबका मिश्रण है।
 
कहानियों के शीर्षक भी किताब के नाम जैसे ही दिलचस्प हैं, जैसे – तांगे वाले गाने, जादूगर, हथौड़ी का सौदा । एक पाठक के तौर पर यह किताब सटीक, गहन और अपनी सी ही प्रतीत होती है। किताब के हर हिस्से में रोचकता की भरमार है जो इसे बच्चों, प्रौढ़, बुजुर्गों सभी के लिए सुगम बनाती है।
 
प्रचण्ड प्रवीर जी द्वारा लिखी गई किताब जिसका शीर्षक कल की बात:गान्धार है। वह अपने नाम के साथ एक दम सटीक बैठती है क्योंकि यह वास्तविक रूप से हमारे और आपके ही जीवन की कल की बात सी प्रतीत होती है । इस किताब के लिए शायद ही इससे बेहतर कोई शीर्षक होता ।किताब का कवर रंगों से भरा है लगता है जैसे जीवन के रंग हो जिसमें कभी अँधेरा होता और कभी उजाला.जो इसके शीर्षक के साथ बिलकुल मेल खाता है।
 
इस किताब की वैसे तो सारी कहानियां मुझे बेहद पसंद आयीं लेकिन कुछ पंक्तियाँ और क़िस्से हैं जो मुझे हमेशा याद रहेंगे। इन्हीं पंक्तियों में से एक पंक्ति है जहाँ लेखक कहते हैं कि-
 
“शराबी को हमें ख़राब नहीं, भटका हुआ कहना चाहिए।”
 
मुझे सबसे ज़्यादा इस किताब के विषयवस्तु ने प्रभावित किया कि कैसे आप अपने आस-पास घट रही घटनाओं को कहानियों में इतनी सुन्दरता से बता सकते हैं। इन्हें पढ़ते हुए लगता है जैसे लेखक के साथ नहीं, ये सब हमारे साथ ही हुआ है । लेखनशैली में साहित्य कहीं- कहीं प्रभावी नहीं है लेकिन वह इस पुस्तक के हिसाब से आवश्यक भी प्रतीत नहीं होता क्योंकि इस किताब की शैली आपबीती विधा में है और आप बीती को शायद उन्हीं शब्दों में गढ़ा जाना चाहिए जैसी वो घटित हुई हों । भाषा प्रबल और प्रगाढ़ न होते हुए पाठक को उसके अंचल का अनुभव करने में पूर्ण रूप से सफल होती प्रतीत होती है ।यह किताब सभी के लिए है जो अपने आस-पास के जीवन को किस्सों के रूप में महसूस और पढ़ना चाहते हैं।
 
प्रचण्ड प्रवीर जी को दिल से धन्यवाद कि उन्होंने इस तरह की सरल और बेहद आकर्षक किताब को लिखा ।एक पाठक के तौर पर मेरी इच्छा है कि लोग इस किताब और इसकी सभी श्रृंखलाओं को अवश्य पढ़ें।

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