साँची पाती - वीना कपूर

7th April 2022

लेखिका - वीना कपूर
प्रकाशक - व्हाइट फैलकॉन पब्लिशिंग

कुछ किताबे पढने योग्य होती है, कुछ किताबें जीवन जीने योग्य होती हैं और कुछ किताबें अनुभव देने योग्य होती हैं। परन्तु, कुछेक किताबें उपर्युक्त तीनों का एक संगम होती हैं। वीणा कपूर द्वारा लिखित किताब “साँची पाती” पढ़ते समय मुझे एक पाठक के तौर पर व्यक्तिगत रूप से यह महसूस हुआ। 

“साँची पाती” सामाजिक पृष्ठभूमि के धरातल पर लिखी गयी किताब है। अर्थात इस किताब के पात्र, इन पात्रों की पृष्ठभूमि, उनके मध्य संवाद, देश काल और वातावरण जैसे पहलू समाज के इर्द गिर्द बुने गए हैं। साँची पाती का कथासार का विमर्श बिंदु यह है कि मन, शरीर, कर्म और सामाजिक व्यवस्था के सामंजस्य को निभाते हुए कैसे दो व्यक्तित्व (एक स्त्री और एक पुरुष) का मिलन होता है। हालाकि, इस विमर्श को शाब्दिक तौर पर एक वाक्य में प्रस्तुत करने भर से ही विमर्श अभिव्यक्त नहीं होता है। 
यदि किताब के कथासार की ओर ध्यानाकर्षण करें तो निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि इस धरती पर पुत्र और पुत्री मानव जाति के इस परम्परा को जीवित रखने में अहम किरदार हैं। माता-पिता द्वारा पुत्र-पुत्री को जन्म देने के पीछे अपने बच्चों से उनकी स्वयं की सामाजिक और अन्य अपेक्षाएं भी होती हैं। जैसे कुटुंब की मान मर्यादा, सामाजिक प्रतिष्ठा, वैभव इत्यादि। यह बात यहीं समाप्त नहीं होती है, बल्कि माता-पिता भी अपने बच्चों के लिए अपने कर्तव्यों तथा सामाजिकता का संचालन जिम्मेदारीपूर्वक वहन करते हैं। क्योंकि माँ-बाप को भी पता होता है कि उन्हें अतीत के धरातल पर वर्तमान का बीज बोकर भविष्य का मजबूत वृक्ष खड़ा करना है। हालांकि, पुत्र और पुत्री में विभेद भी किया जाता रहा है। इस क्रम में इस बीज को बड़ा और विकसित होने तक जीवन में अनेकों बाधाएं, भटकाव, विभिन्न आकर्षण-विकर्षण, युवा अवस्था की कमजोरियां जैसी परिस्थितयां भी सामने आती हैं।

किताब से परिचित होने के क्रम में हमारी मुलाक़ात शैलेन्द्र नामक एक पुरुष पात्र से होता है। शैलेन्द्र नामक बीज का भी उपर्युक्त समस्याओं से सामना होता है। इस बात को स्वयं शैलेन्द्र पृष्ठ संख्या 19 में कहता है- “मेरे जन्म के पीछे ‘अभागा तथा भाग्यवान’ जैसी दो कथाएं चल रही हैं। जो अपने जीवन के विभिन्न हिस्सों में अलग अलग लड़कियों से मिलता है। जिसमें पहली लड़की होती है चित्रा। चित्रा के बाद सुधा, सीमा और प्रिया। प्रत्येक से शैलेन्द्र का लगाव, सहमती और असहमति का स्तर भी अलग अलग होता है। जिनके पीछे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियाँ कारण बनती हैं। इन कारणों को वीणा कूपर ने बहुत ही संजीदा से पेश किया है। फिर चाहे बात लड़का और लड़की के मध्य समाज या माता-पिता द्वारा भेद की बात हो या समाज के रुढ़िवादी  सोच की बात हो। इसलिए तो चित्रा शैलेन्द्र से कहती है – “हमारे घर में किसी बात की कमी नही है पर कभी अगर किसी बात की है तो वह है “सोच”।“ अंततः शैलेंद्र का मिलन मीता से होता है और यही मिलन शैलेन्द्र के लिए अंतिम मिलन होता है। मनो, शैलेन्द्र और मीता के लिए उनका मिलन प्रकृति की ओर से भी पूर्णता का संदेश हो, लेकिन समाज के लिए सामाजिक रुढियों को समाप्त करना हम पाठकों के लिए संदेश हो। मसलन किताब के पृष्ठ संख्या 31 पर एक किरदार द्वारा यह कहना कि “मैंने बहुत सारे नावेल पढ़े हैं मैंने पाया है कि जर, जोरू, और जमीन, यह तीन बातें मनुष्य को नष्ट करने के लिए काफी होती हैं।”

भाषा शैली के दृष्टिकोण से किताब की भाषा सरल और सहज है। क्षेत्रीय और आंचलिक शब्दों का प्रयोग मिलता है। जैसे ‘चुप रह’, ‘भाई सा’, ‘ऊहूँ’, ‘काका सा’, ‘काकी सा’इत्यादि। किताब में प्रयुक्त संवाद बेहद संदेशपरक और सम्वेदनशील है। जैसे- मेरे जन्म के पीछे ‘अभागा तथा भाग्यवान’ जैसी दो कथाएं चल रही हैं। जहाँ मेरे स्वाभिमानी पिता यह मानने को तैयार नहीं है कि मेरे जन्म ने उन्हें पद प्रतिष्ठा दिलवाई है। पर यह मानने के लिए दृढ संकल्पित है कि हमारे परिवार के दुखद घटनाओं के पीछे शायद इसका जन्म लेना ही उतरदायी है। या फिर लड़के से अधिक उसके माता-पिता अधिक महत्वकांक्षी होते हैं। वो अपनी छवि को बेटे के साथ जोड़कर देखते हैं। कुछेक जगहों पर सम्वादों में दार्शनिकता का भाव-बोध भी महसूस होता है। जैसे- ‘मनुष्य को जीवित रहने के लिए किसी आधार की जरुरत होती है जिसका अभाव मनुष्य परिवार रूपी समुद्र में अगर एक बूंद भी न पा सके। वो उसका जीना दूभर हो जाता है, जिसका मेरे घर में निनांत अभाव था’।

किताब में कथा-विस्तार और पात्रों के मध्य वार्तालाप में प्रयोग किये गये कुछ गीत और मुहावरे-कहावतें पाठकों में रूचि उत्पन्न करते हैं। जैसे कुछेक मुहावरे निम्नलिखित है-‘बद् अच्छा बदनाम बुरा’, ‘दूध के जले हैं छाछ को भी फूंक फूंक कर पी रहे हैं’। एक प्रसिद्द कहावत जिसका प्रयोग किया गया है- ‘नारी का सर्वस्व पति के चरणों में तथा उसकी आज्ञा पालन करने में है’, ‘अपना सोचा कभी नहीं होता भाग्य करे सो होय’। ऐसे ही कुछ गीत है। जैसे ‘कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा’, ‘मैं ये सोच कर उसके दर से चला था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझको’।

निष्कर्षतः, यह किताब “साँची पाती” सच में अपने नाम को चरितार्थ करती है। जिसका अर्थ है- साँची अर्थात एकत्रित करना या जुटाना और पाती अर्थात चिट्ठी। एक पाठक के तौर पर आप यह किताब पढ़ सकते हैं। वीणा कपूर ने अपने इस किताब के माध्यम से युवा वर्ग के साथ माता-पिता के संवेदनशीलता और जिम्मेदारियों पर सफल कलम चलाया है।
 

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