जीवन जैसे जिया - पूर्व प्रधानमन्त्री चंद्रशेखर

17th April 2022

किताब - जीवन जैसे जिया 
लेखक - पूर्व प्रधानमन्त्री चंद्रशेखर 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन

ये बात साल 1977 की है। देश में पिछले 18 महीनों से प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी की 25 जून 1975 को लगाई इमरजेंसी ख़त्म हो गई थी और एक बार फिर से चुनाव कराये गए। इमरजेंसी के बाद हुए इन चुनावों में कई पार्टियों ने मिलकर इंदिरा गाँधी की कांग्रेस को हराने के लिए जयप्रकाश नारायण (जेपी) के आदेश और इच्छा से एक साथ मिलकर जनता पार्टी बनाई, जिसके अध्यक्ष थे युवा नेता चंद्रशेखर। जनता पार्टी ने लोकसभा के चुनावों के साथ-साथ कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को भारी अंतर से हराया। इसमें एक राज्य था हरियाणा। इसी चुनाव में हरियाणा की अम्बाला विधानसभा सीट से केवल 25 साल की एक लड़की विधायक चुनी गई, लड़की का नाम था सुषमा स्वराज। सुषमा अपने बेहतरीन भाषणों, आंदोलनों और मशहूर नेता जॉर्ज फर्नांडिस का बड़ौदा- डायनामाइट केस लड़ने के चलते जनता पार्टी के बड़े नेताओं जैसे जेपी, मधु लिमिए और चंद्रशेखर की नज़रों में आ चुकी थीं। अब हरियाणा से जीती इस लड़की को काम का इनाम मिलना तो तय था और इनाम मिला भी। मिला जनता पार्टी की तरफ़ से हरियाणा के मुख्यमंत्री बनाये गए चौधरी देवीलाल की सरकार में मंत्री पद। देवीलाल के ऊपर सुषमा को कैबिनेट मंत्री पद देने के लिए अध्यक्ष चंद्रशेखर का दबाव था तो पद दिया भी गया। मंत्रालय मिला 'श्रम और रोजगार'।25 साल की लड़की सबसे युवा मंत्री बन चुकी थी। तीन महीने बीते ही थे कि देवीलाल को सुषमा खटकने लगीं। फरीदाबाद की मर्चेंट चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स की मीटिंग में देवीलाल ने ऐलान किया कि सुषमा कैबिनेट मंत्री के लायक नहीं हैं इसलिए उनका मंत्री पद लिया जाता है।

सुषमा को एक बार फिर अध्यक्ष चंद्रशेखर याद आये। वो मधु लिमिए के साथ अध्यक्ष जी से मिलने पहुँचीं और बताया कि देवीलाल उन्हें मंत्री पद से हटा रहे हैं। चंद्रशेखर बोले- ऐसा कुछ नहीं होगा। चौधरी साहब मुझसे पूछे बिना ये फैसला नहीं ले सकते। सुषमा वापस आ गईं। शाम को खबर आई कि देवीलाल ने सुषमा को कैबिनेट से बाहर कर दिया है। चंद्रशेखर ने देवीलाल को बुलाया और समझाया कि सुषमा को मंत्री रहने दीजिये। लेकिन देवीलाल नहीं माने, अड़ गए। अब अड़ने की बारी चंद्रशेखर की थी। वो कुर्सी से उठे और बोले- चौधरी देवीलाल अगर सुषमा मंत्री नहीं तो तुम मुख्यमंत्री नहीं। मैं अध्यक्ष होने के नाते तुम्हे पार्टी और मुख्यमंत्री पद से निकाल दूंगा। देवीलाल को पसीने आ गए। भागते- भागते पहुंचे उप प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह के पास। सारी बात बताई। बात सुनने के बाद चरण सिंह ने चंद्रशेखर को बुलाया और पूछा- क्या देवीलाल ने तुम्हें इस फ़ैसले के बारे में बताया था। ज़वाब मिला- नहीं। चरण सिंह सब समझ गए और गुस्साते हुए बोले-देवीलाल को अभी पार्टी से निकाल दो। देवीलाल समझ गए कि बात नहीं बनेगी और फिर से सुषमा को मंत्री पद वापस कर दिया। अंत में चंद्रशेखर ने देवीलाल और सुषमा को एक साथ अपने घर बुलाया। एक-दूसरे को सामने बैठाकर देवीलाल से कहा – सुषमा आपकी बेटी की उम्र की है, उसी तरह इसका ख्याल रखिए। गलतियाँ माफ़ करिए और रास्ता दिखाइए।

ये जो क़िस्सा आपने सुना इसे हम लाये थे एक कमाल की किताब से। किताब का नाम- ‘जीवन जैसे जिया’। किताब को लिखा है देश के प्रधानमंत्री रहे चन्द्रशेखर जी ने। तथ्यों के साथ ये किताब हर उस इंसान के लिए बेहद ज़रूरी है जो देश की राजनीति में थोड़ी सी भी दिलचस्पी रखता है। किताब चन्द्रशेखर की जीवनी है जिसमें उनके बचपन से लेकर राजनीतिक जीवन तक के सफर को बड़े ही सुन्दर ढंग से पिरोया गया है। इसमें चन्द्रशेखर के जीवन की अच्छाइयों  के साथ उनकी कमियों को भी लिखा गया है जो इसे और बेहतर बनाती हैं। चंद्रशेखर जी के जीवन को जानने और उनके देश और समाज के लिए नज़रिए को समझने की चाह रखने वालों के लिए ये किताब बहुत ज़रूरी साबित होती है क्योंकि उनकी इस किताब में ज़िंदगी के हर पहलू जैसे बचपन से लेकर राजनीति के बारे में काफी अनजाने ब्यौरे विस्तार से हैं।

चूँकि चंद्रशेखर की पहचान एक नेता के रूप में रही है इसलिए उनके जीवन के राजनीति से जुड़े प्रसंगों को ज़्यादा लिखा गया है जोकि एक राजनीतिक जीवनी में होना ही चाहिए। चन्द्रशेखर का कांग्रेस में जाना, तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी से उनकी लड़ाई, कांग्रेस को छोड़ना, इमरजेंसी, जनता पार्टी के गठन के साथ-साथ और भी कई पहलुओं से जुड़े उन प्रसंगों को जोड़कर जिन्हें आम लोगों के बीच आना ही चाहिए , ये जीवनी लिखी गई है। किताब में कुल 10 चैप्टर हैं जो बारी-बारी से चंद्रशेखर के आगे बढ़ते हुए जीवन को साथ लेकर आगे चलते हैं। इस किताब की सबसे ख़ास बात है वो किस्से जो इसमें कई जगह लिखे गए हैं कि कैसे सम्मान के लिए चंद्रशेखर अपने कॉलेज के दिनों में बड़े नेता राम मनोहर लोहिया से भी भिड गए थे। क्यों बड़े शायर फ़िराक गोरखपुरी ने चंद्रशेखर को कबीर का एक दोहा हमेशा याद रखने के लिए कहा था। 

नेता परदे के पीछे हुई राजनीति को जनता के सामने लाने से कतराते हैं लेकिन चंद्रशेखर ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इस किताब में खुलकर राजनीति को समझाने की कोशिश की है और इसमें होने वाली अच्छी और बुरी दोनों बातों को विस्तार से बताया है।
राजकमल प्रकाशन से आई ये किताब आप सभी को ज़रूर पढनी चाहिए।
 

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