मेरा क्या कसूर - वीना कपूर

24th April 2022

पुस्तक का नाम - मेरा क्या कसूर
लेखिका - वीना कपूर
प्रकाशक - व्हाइट फैल्कॉन पब्लिशिंग


कहते हैं ना कि इस धरती पर प्रत्येक जीव का महत्व समान है। फिर चाहे यह जीव पशुओं की श्रेणी में आता हो अथवा इंसानों की श्रेणी में आता हो। यदि इस बात से इत्तेफाक रखा जाए तो एक संवेदनशील पाठक के तौर पर एक प्रश्न मन में ज़रुर आता है। इस धरती पर उन सभी शिशुओं का क्या, जिनके माता-पिता उन्हें जन्म देकर छोड़ देते हैं? कभी किसी अनाथायाली में, कभी किसी सड़क के किनारे, तो कभी रेलवे पटरी पर।

वीना कपूर की किताब “मेरा क्या कसूर” इसी सवाल पर एक बेहद संजीदा विमर्श और संदेश है। किताब की कथा-वस्तु पर बात करें तो यह किताब भारतीय परम्परा और संस्कृति पर हावी होती आधुनिक तथाकथित पाश्चात्य संस्कृति के विभिन्न पक्षों को उजागर करती है। वर्तमान समय में  युवा पीढ़ी जिनमें अपार ऊर्जा और सम्भावनाएं भरी हुई हैं। क्या ये इस ऊर्जा और सम्भावनाओं को सही दिशा दे पा रहे हैं? 

वीना कपूर अपने इस किताब में इस बात पर चर्चा करती हैं कि कैसे ऐतिहासिक दृष्टान्तों को आधार मानकर आजकल लोग रिश्तों को शर्मसार कर रहे हैं। अपनी जिम्मेदारियों से पीठ दिखा कर भाग रहे हैं। 

स्त्री और पुरुष इस धरती पर मानव सन्तति के निरंतरता के लिए आवश्यक हैं। यह बहुत ही प्राकृतिक है। लेकिन जब युवक और युवतियां अपने मानसिक और शारीरिक विकास के क्रम को उचित दिशा में नहीं समझ पाते हैं, तो उनकी संगति गलत होती जाती है। भारतीय संस्कृति और परम्परा के अनुसार सन्तति उत्पति का अधिकार विवाहोपरांत प्राप्त होता है। परंतु आज की युवा पीढ़ी इस अधिकार और व्यवस्था को नकारते हुए इसका उल्लंघन कर रही है। अवैध तरीके से इस अधिकार को प्राप्त कर इसे ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ का नाम देती है। समय से पूर्व और उचित व्यवस्था के विपरीत इस अधिकार का दुष्परिणाम भी दिखाई देता है। यह दुष्परिणाम विभिन्न रूपों में दिखता है। इस व्यवस्था से उत्पन्न सन्तान को फिर यही युवा पढ़ी अपनाने से इंकार करती है। इस दुष्परिणाम को वैध साबित करने के लिए कुंती और महादानी कर्ण का कुर्तक देते हैं। सवाल यह है कि यदि एक क्षण के लिए यदि इन युवक - युवतियों को नासमझ मानकर माफ़ भी कर दिया जाये तो, उस संतान का क्या होगा जिसे इन लोगों ने जन्मा है और अपनी पहचान देने से इंकार कर रहे हैं? क्या ये युवक और युवती इस बालक/बालिका और समाज के साथ न्याय कर रहे हैं? ऐसे ही सवाल और अंतर्वेदना इस उपन्यास के घटक और मूल आत्मा हैं।

किताब के अन्य पक्षों यथा भाषा शैली, किताब का मुख्य आवरण, पात्र, संवाद पर बात करें तो यह किताब इन सबसे परिपूर्ण हैं। किताब में प्रयुक्त शब्द बेहद सरल और सहज हैं।  इसकी वजह से पाठक किरदारों से रच बस जातें हैं। 
संवाद की दृष्टिकोण से कई जगह संवादों में दार्शनिकता और संदेश मिलता है। मसलन “अरे कौन सी कृपा कर रहें हैं ये दूरदर्शन वाले। औरत की, महिलाओं की, स्त्रियों की चिंता भला आज तक समाज में किसी को हुई है क्या। उसकी जिन्दगी तो बस “नून, तेल, लकड़ी में ही बंध कर रह गई है”

कहीं - कहीं उलाहने भरे वाक्य कहावतों का स्वाद दे जाते हैं। जैसे पृष्ठ संख्या 04 पर एक वाक्य है- “बड़ा ज्ञान बांटने आ गया है।”
किताब का आवरण बेहद शानदार और संदेशपरक है। रेलवे की पटरी पर एकपुरुष एक बालक को ले जाते हुए दिखाई दे रहा है और उन दोनों को दूर खड़ी एक स्त्री देख रही है। यह चित्र ही इस किताब का विमर्श है।

निष्कर्षतः यह किताब वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए एक सीख और भारतीय संस्कृति के प्रति एक सजगता देती है। 
बुकनर्ड्स हिंदी इस किताब को पढने के लिए आपको अनुशंसित करता है।
 

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