जन्मदिन विशेष : जौन एलिया

14th December 2021


सैय्यद हुसैन जौन असगर नकवी , जिन्हें हम जौन एलिया के नाम से जानते हैं मशहूर उर्दू कवि और शायर थे  | इनका जन्म 14 दिसम्बर 1931 को अमरोहा में हुआ था | इनके पिता शफ़ीक़ एलिया साहित्य और खगोल के ज्ञाता थे , साथ ही अरबी, फारसी, संस्कृत , अंग्रेजी और यहूदी भाषा के विद्वान थे |उनकी युवावस्था के दौरान भारत विभाजन हो गया और अपनी इच्छा के विरुद्ध बंटवारे के 10 साल बाद जौन कराची जा बसे | वहीँ 8 नवम्बर 2002 को उनका इंतकाल हो गया | लेखिका जाहिदा हिना से उन्होंने 1970 में शादी की पर यह रिश्ता ना चल सका | व्यक्तिगत जीवन से निराश जौन ने अपना दर्द अपनी कविताओं में लिखा| उनकी कविताएँ और शायरी  अपने अंतहीन दर्द के लिए जानी जाती हैं | जौन कहते कि  मुझे मेरे तबाह होने का मलाल नहीं |
जिंदगी में खुद को नाकामयाब मानने वाले जौन 8 नवंबर 2002 को चल बसे | लेकिन उनके शेर आज भी फेसबुक, ट्विटर, किताबों और आशिकों के बीच जिंदा हैं| शेरों –शायरियां करने वाले आज भी खुद को जौन का दीवाना कहते हैं | 

पाकिस्तान हिजरत करने के बाद यूँ तो जौन साहब कई बार हिन्दुस्तान आये पर अमरोहा दो बार ही जा सके | जब एक बार 1978 में वे अमरोहा आए और एक मुशायरे में उन्हें पाकिस्तान का मशहूर शायर कह कर पुकारा गया तो जौन एलिया फफक पड़े |

मंच से उन्होंने कहा- “मैं पाकिस्तानी नहीं हिन्दुस्तानी हूँ ” और यही से उन्हें अपनी ग़ज़लों के लिए नयी जमीन मिली |
“हम आंधियों के बन में कारवां के थे 
जाने कहाँ से आये हैं, जाने कहाँ के थे 
मिलकर तपाक से हमें ना कीजिये उदास 
ख़ातिर न कीजिये कभी हम भी यहाँ के थे 
क्या पूछते हो नाम-ओ-निशान-ए-मुसाफिरों 
हिंदोस्ता में आये हैं हिंदोस्ता के थे || “

जौन एलिया के बारे में मेरी कलम बस यही कहती है , साहित्य कब शोहरत का मोहताज़ रहा ? लिखने वाले तो दौर बदल कर चले गये |

आइये पढ़ते हैं उनके कुछ चुनिंदा शेर :

“कोई मुझ तक पहुँच नहीं पाता 
इतना आसान है पता मेरा |”

“क्या बताऊँ के मर नहीं पाता 
जीते जी जब से मर गया हूँ मैं |”

एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं 
सबके दिल से उतर गया हूँ मैं |”

बड़ा एहसां हम फरमा रहे हैं 
के उनके ख़त उन्हें लौटा रहे हैं |


उनकी शायरी गजलों क़त’आत और जीवनी को एक साथ पढने के लिए आप मुन्तजिर फिरोजाबादी  की किताब
जौन एलिया : एक अजब गजब शायर पढ़ सकते हैं | 


 

Categories

आर्काइव